हमारे देश में बहुत से त्योहार मनाया जाते हैं जैसे रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, नवरात्रि, दीपावली और होली। इन्हीं त्योहारों में से आज हम आपको Why is the festival of colour celebrated के बारे में बताने जा रहे हैं।आज हम इस पोस्ट में आपको होली क्यों मनाई जाती है? होलिका दहन क्यों हुआ था? होली में रंगों के साथ कैसे खेले के बारे में बताने जा रहे हैं।
Why is the festival of colour celebrated
होली क्या है – What is Holi in Hindi
Holi का दिन बड़ा ही शुभ दिन होता है। ये पर्व हर साल वसंत ऋतू के समय फागुन यानि की मार्च के महीने में आता है जिसे पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है और ये सबसे ज्यादा ख़ुशी देने वाला त्यौहार होता है। ये बसंत का त्यौहार है और इसके आने पर सर्दी ख़तम हो जाती है और गर्मी की शुरुआत होती है।
इस साल 8 मार्च को देश भर में हर जगह होली खेली जाएगी। भारत के कुछ हिस्सों में इस त्यौहार को किसान अच्छी फसल पैदा होने की ख़ुशी में भी मनाते हैं।
होली का ये उत्सव फागुन के अंतिम दिन होलिका दहन की शाम से शुरू होता है और अगले दिन सुबह सभी लोग आपस में मिलते हैं, गले लगते हैं और एक दुशरे को रंग और अबीर लगाते हैं। इस दौरान पूरी प्रकृति और वातावरण बेहद सुन्दर और रंगीन नज़र आती है। इस पर्व को एकता, प्यार,खुसी, सुख और बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में जाना जाता है।
होली क्यों मनाई जाती है – Why is the festival of colour celebrated?
हिंदू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार होलिका दहन अर्थात होली त्यौहार मनाने की कथा पुरानी कथाओं से जुड़ी हुई है। सतयुग में हिरण्यकश्यप नामक एक राजा थे। उन्होंने खुद को इतना शक्तिशाली बना लिया था कि खुद को भगवान समझने लगे थे। पूरे राज्य में खुद को भगवान कहने का अधिकार जमाते थे। इस घमंड को दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया था। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र भक्त पहलाद को मृत्युदंड देने हेतु अनेक उपाय किए थे। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका द्वारा प्रहलाद को गोद में लेकर जलाने की चेष्टा की गई थी। परंतु होलीका खुद जल गई। भक्त प्रहलाद बच गए। इसी मान्यता को लेकर आज भी होली का त्यौहार मनाया जाता है। होली का त्यौहार बुराई पर अच्छाई की विजय को साबित करता है। अधर्म पर धर्म की विजय करता है। नकारात्मक भावनाओं को सकारात्मक प्रभाव में ढालने की कोशिश करता है। अनेक विशेषताओं के साथ होली का त्यौहार मनाया जाता है। इसे रंगों का त्योहार भी कहा जाता है।
होलिका दहन की कथा।
सतयुग में हिरण्यकश्यप नामक के एक राजा थे। राजा ने ब्रह्मा, शिव से कठिन घोर तपस्या कर अजर-अमर होने का वरदान मांगा था। हिरण्यकश्यप को ब्रह्माजी ने अजर-अमर होने का वरदान तो दे दिया परंतु उन्हें कहा कि ना तो आप दिन में मरोगे, ना शाम को मरोगे ना, अस्त्र से ना शस्त्र से, ना मानव से ना जानवर से, ना आकाश में ना पाताल में, ना अंदर ना बाहर आपके प्राणों को कोई आपसे छीन नहीं सकेगा। ऐसा वरदान हिरण्यकश्यप को ब्रह्माजी से प्राप्त हुआ। हिरण्यकश्यप राक्षस जाति से थे। तो उन्हें अपनी शक्तियों पर घमंड होने लगा। वह खुद को भगवान समझने लगा। पूरी प्रजा में खुद को भगवान कहने का आदेश जारी कर दिया। हिरण्यकश्यप को भगवान विष्णु से अधिक घृणा थी। धीरे-धीरे समय बीतता चला गया। कुछ दिनों बाद हिरण्यकश्यप की पत्नी गर्भवती हुई। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने अपनी दिव्य दृष्टि से पता किया कि जो महारानी के पेट में संतान पल रही है। वह विष्णु भक्त है और अभी से विष्णु का जाप कर रही है। यह बात जब हिरण्यकश्यप को पता चली, तो उसने रानी के गर्भ को गिराने के अनेक उपाय किए। परंतु सफल नहीं हो सके। कुछ दिनों बाद बालक का जन्म हो गया। बालक का बचपन से ही नाम प्रहलाद रखा गया। प्रहलाद भगवान विष्णु के भक्त थे और आठों पहर भगवान विष्णु का जाप किया करते थे। भक्त प्रहलाद का जाप करना उनके पिता हिरण्यकश्यप को अच्छा नहीं लगता था। तो उन्होंने भक्त प्रहलाद को प्राण दंड दे दिया। प्रह्लाद को अनेक तरीकों से मृत्यु तक पहुंचाने की कोशिश की गई। परंतु सभी उपाय असफल रहे।
कुछ दिनों बाद हिरण्यकश्यप की बहन होलिका ने प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर जलाने की बात हिरण्यकश्यप को बताई। होलिका को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था की अग्नि में उसका शरीर नहीं जलेगा। इसी दिव्य शक्ति का होलिका ने गलत उपयोग करते हुए भक्त प्रहलाद को गोद में लेकर आग की चिता पर बैठ गई। भक्त प्रहलाद जैसे ही भगवान विष्णु का जाप करने लगे तो भक्त पहलाद को आंच भी नहीं आई। धीरे-धीरे होलिका का पूरा शरीर जल कर राख हो गया।
राधा और कृष्ण की कहानी
उत्तर प्रदेश में ब्रज (जहां भगवान कृष्ण बड़े हुए) के क्षेत्र में कृष्ण और राधा के भक्ति प्रेम की याद में रंग पंचमी के दिन तक होली को एक विशाल त्योहार के रूप में मनाया जाता है। इसके साथ एक स्थानीय कथा भी जुड़ी हुई है। जब कृष्ण एक शिशु थे तो उन्होंने राक्षसी पूतना के जहरीले स्तन का दूध पीने के बाद एक विशिष्ट नीली त्वचा का रंग प्राप्त किया। बाद में जब वह जवान हुआ तो उसे अक्सर इस बात का मलाल रहता था। कि कहीं गोरे रंग की राधा या गांव की दूसरी लड़कियां उनके सांवले रंग की वजह से उन्हें पसंद नहीं करेंगी। उनकी हताशा देखते हुए कृष्ण की मां ने उन्हें जाकर राधा के चेहरे को किसी भी रंग से रंगने के लिए कहा। इसलिए जब कृष्ण ने राधा को रंग लगाया तो वह दोनों एक दूसरे के हो गए और तभी से लोगों ने होली पर रंगों से खेलना शुरू कर दिया।
अक्सर पूछे गए सवाल।
होली के बाद धूलंडी क्यों मनाई जाती है?
फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होली का दहन किया जाता है तथा अगले दिन धूलंडी रंगों का त्योहार मनाया जाता है। धूलंडी के दिन आपसी भाईचारे एवं प्रेम प्रभाव को स्थापित करने हेतु रंगों का उपयोग किया जाता है। ताकि आपसी मेलजोल को बढ़ाया जा सके।
होली की शुरुआत कैसे हुई?
हिरण्यकश्यप के मरने से पहले ही होलिका के रूप में बुराई जल गई और अच्छाई के रूप में भक्त प्रहलाद बच गए। – उसी दिन से होली को जलाने और भक्त प्रहलाद के बचने की खुशी में अगले दिन रंग गुलाल लगाए जाने की शुरुआत हो गई। – इतिहास के जानकार हरिओम दुबे बताते हैं कि एरच को भक्त प्रहलाद की नगरी के रूप में ही जाना जाता है।
होली का दूसरा नाम क्या है?
इतिहास होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा गया है।
मुसलमान होली क्यों नहीं खेलते हैं?
क्योंकि कुछ मुस्लिमओ में दिमाग मे कट्टरपंथी होती है, उनके हिसाब से रंग से होली खेलना काफिरो का काम है, मोमिनो का ऐसा कोई त्योहार नही है। इसीलिए वह भड़क जाते है।
होली में रंग से क्यों खेलते हैं?
ऐसे शुरू हुआ होली पर रंग लगाने का चलन- जब वह राधा और अन्य गोपियों को तरह-तरह के रंगों से रंग रहे थे, तो नटखट श्री कृष्ण की यह प्यारी शरारत सभी ब्रजवासियों को बहुत पंसद आई। माना जाता है, कि इसी दिन से होली पर रंग खेलने का प्रचलन शुरू हो गया और इसीलिए होली पर रंग-गुलाल खेलने की यह परंपरा आज भी निभाई जा रही है।
होली के त्योहार से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
होलिका दहन से यह आध्यात्मिक संदेश मिलता है कि ईश्वर सत्य है। जो अच्छाइयों की राह पर चलता है, उसे स्वत: ईश्वरीय सुरक्षा प्राप्त होती है। भक्तराज प्रच्चद से हमें ईश्वर में आस्था रखकर अपने कर्म पर अटल रहने की प्रेरणा मिलती है। होली कृषि और धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा हुआ है।
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